एकस्मिञ्शयने पराङ्मुखतया वीतोत्तरं ताम्यतोर्
अन्योन्यस्य हृदि स्थितेऽप्यनुनये संरक्षतोर्गौरवम् ।
दम्पत्योः शनकैरपाङ्गवलनान्मिश्रीभवच्चक्षुषो-
र्भग्नो मानकलिः सहासरभसं व्यासक्तकण्ठग्रहम् ॥
एकस्मिञ्शयने पराङ्मुखतया वीतोत्तरं ताम्यतोर्
अन्योन्यस्य हृदि स्थितेऽप्यनुनये संरक्षतोर्गौरवम् ।
दम्पत्योः शनकैरपाङ्गवलनान्मिश्रीभवच्चक्षुषो-
र्भग्नो मानकलिः सहासरभसं व्यासक्तकण्ठग्रहम् ॥
अन्योन्यस्य हृदि स्थितेऽप्यनुनये संरक्षतोर्गौरवम् ।
दम्पत्योः शनकैरपाङ्गवलनान्मिश्रीभवच्चक्षुषो-
र्भग्नो मानकलिः सहासरभसं व्यासक्तकण्ठग्रहम् ॥
अन्वयः
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एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया वीत-उत्तरं ताम्यतोः, अन्योन्यस्य हृदि स्थिते अपि अनुनये गौरवं संरक्षतोः, दम्पत्योः शनकैः अपाङ्ग-वलनात् मिश्रीभवत्-चक्षुषोः, मान-कलिः स-हास-रभसं व्यासक्त-कण्ठ-ग्रहं भग्नः ।
Summary
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A couple, lying on the same bed, turned away from each other, silently suffering. Though their hearts longed for reconciliation, pride held them back. As their eyes slowly met from the corners, their lovers' quarrel broke, and they embraced each other with laughter.
पदच्छेदः
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| एकस्मिन् | एक (७.१) | on one |
| शयने | शयन (७.१) | bed |
| पराङ्मुखतया | पराङ्मुखता (३.१) | by being turned away |
| वीत | वीत (वि√इ+क्त) | without |
| उत्तरम् | उत्तर | reply |
| ताम्यतोः | ताम्यत् (√तम्+शतृ, ६.२) | of the two suffering |
| अन्योन्यस्य | अन्योन्य (६.१) | of each other |
| हृदि | हृद् (७.१) | in the heart |
| स्थिते | स्थित (√स्था+क्त, ७.१) | being present |
| अपि | अपि | even though |
| अनुनये | अनुनय (७.१) | desire for reconciliation |
| संरक्षतोः | संरक्षत् (सम्√रक्ष्+शतृ, ६.२) | of the two preserving |
| गौरवम् | गौरव (२.१) | pride |
| दम्पत्योः | दम्पती (६.२) | of the couple |
| शनकैः | शनकैस् | slowly |
| अपाङ्ग | अपाङ्ग | corner of the eye |
| वलनात् | वलन (५.१) | from the turning of |
| मिश्रीभवत् | मिश्रीभवत् (√मिश्रीभू+शतृ) | meeting |
| चक्षुषोः | चक्षुस् (६.२) | whose eyes were |
| भग्नः | भग्न (√भञ्ज्+क्त, १.१) | was broken |
| मान | मान | pride's |
| कलिः | कलि (१.१) | quarrel |
| स | स | with |
| हास | हास | laughter |
| रभसम् | रभसम् | impetuously |
| व्यासक्त | व्यासक्त (वि+आ√सञ्ज्+क्त) | engaged in |
| कण्ठ | कण्ठ | neck |
| ग्रहम् | ग्रह | embracing |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | क | स्मि | ञ्श | य | ने | प | रा | ङ्मु | ख | त | या | वी | तो | त्त | रं | ता | म्य | तो |
| र | न्यो | न्य | स्य | हृ | दि | स्थि | ते | ऽप्य | नु | न | ये | सं | र | क्ष | तो | र्गौ | र | वम् |
| द | म्प | त्योः | श | न | कै | र | पा | ङ्ग | व | ल | ना | न्मि | श्री | भ | व | च्च | क्षु | षो |
| र्भ | ग्नो | मा | न | क | लिः | स | हा | स | र | भ | सं | व्या | स | क्त | क | ण्ठ | ग्र | हम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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