काञ्च्या गाढतरावरुद्धवसनप्रान्ता किमर्थं पुन-
र्मुग्धाक्षी स्वपितीति तत्परिजनं स्वैरं प्रिये पृच्छति ।
मातः स्वप्तुमपीह वारयति मामित्याहितक्रोधया
पर्यस्य स्वपितिच्छलेन शयने दत्तोऽवकाशस्तया ॥
काञ्च्या गाढतरावरुद्धवसनप्रान्ता किमर्थं पुन-
र्मुग्धाक्षी स्वपितीति तत्परिजनं स्वैरं प्रिये पृच्छति ।
मातः स्वप्तुमपीह वारयति मामित्याहितक्रोधया
पर्यस्य स्वपितिच्छलेन शयने दत्तोऽवकाशस्तया ॥
र्मुग्धाक्षी स्वपितीति तत्परिजनं स्वैरं प्रिये पृच्छति ।
मातः स्वप्तुमपीह वारयति मामित्याहितक्रोधया
पर्यस्य स्वपितिच्छलेन शयने दत्तोऽवकाशस्तया ॥
अन्वयः
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'मुग्धाक्षी काञ्च्या गाढतर-अवरुद्ध-वसन-प्रान्ता (सती) पुनः किमर्थं स्वपिति?' इति प्रिये स्वैरं तत्-परिजनं पृच्छति (सति), 'मातः, इह माम् स्वप्तुम् अपि वारयति' इति आहित-क्रोधया तया शयने स्वपिति-च्छलेन पर्यस्य अवकाशः दत्तः ।
Summary
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When the lover playfully asked the attendants why the lovely-eyed girl was sleeping with her garment tightly held by her girdle, she, feigning anger, exclaimed, "Mother! He won't even let me sleep here!" and, turning over on the bed under the pretext of sleeping, made space for him.
पदच्छेदः
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| काञ्च्या | काञ्ची (३.१) | by the girdle |
| गाढतर | गाढतर | more tightly |
| अवरुद्ध | अवरुद्ध (अव√रुध्+क्त) | held |
| वसन | वसन | garment |
| प्रान्ता | प्रान्त (१.१) | whose edge is |
| किम् | किम् | why |
| अर्थम् | अर्थम् | for what reason |
| पुनः | पुनर् | again |
| मुग्धाक्षी | मुग्धाक्षी (१.१) | the lovely-eyed girl |
| स्वपिति | स्वपिति (√स्वप् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is sleeping |
| इति | इति | thus |
| तत् | तद् | her |
| परिजनम् | परिजन (२.१) | attendants |
| स्वैरम् | स्वैरम् | playfully |
| प्रिये | प्रिय (७.१) | when the lover |
| पृच्छति | पृच्छत् (√प्रछ्+शतृ, ७.१) | was asking |
| मातः | मातृ (८.१) | O mother |
| स्वप्तुम् | स्वप्तुम् (√स्वप्+तुमुन्) | to sleep |
| अपि | अपि | even |
| इह | इह | here |
| वारयति | वारयति (√वृ +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | prevents |
| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
| इति | इति | thus |
| आहित | आहित (आ√धा+क्त) | feigning |
| क्रोधया | क्रोधा (३.१) | by her who was angry |
| पर्यस्य | पर्यस्य (परि√अस्+ल्यप्) | turning over |
| स्वपिति | स्वपिति (√स्वप्+शतृ) | sleeping |
| च्छलेन | छल (३.१) | under the pretext of |
| शयने | शयन (७.१) | on the bed |
| दत्तः | दत्त (√दा+क्त, १.१) | was given |
| अवकाशः | अवकाश (१.१) | space |
| तया | तद् (३.१) | by her |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| का | ञ्च्या | गा | ढ | त | रा | व | रु | द्ध | व | स | न | प्रा | न्ता | कि | म | र्थं | पु | न |
| र्मु | ग्धा | क्षी | स्व | पि | ती | ति | त | त्प | रि | ज | नं | स्वै | रं | प्रि | ये | पृ | च्छ | ति |
| मा | तः | स्व | प्तु | म | पी | ह | वा | र | य | ति | मा | मि | त्या | हि | त | क्रो | ध | या |
| प | र्य | स्य | स्व | पि | ति | च्छ | ले | न | श | य | ने | द | त्तो | ऽव | का | श | स्त | या |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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