दम्पत्योर्निशि जल्पतोर्गृहशुकेनाकर्णितं यद्वच-
स्तत्प्रातर्गुरुसंनिधौ निगदतस्तस्योपहारं वधूः ।
कर्णालंकृतिपद्मरागशकलं विन्यस्य चञ्चूपुटे
व्रीडार्ता प्रकरोति दाडिमफलव्याजेन वाग्बन्धनम् ॥
दम्पत्योर्निशि जल्पतोर्गृहशुकेनाकर्णितं यद्वच-
स्तत्प्रातर्गुरुसंनिधौ निगदतस्तस्योपहारं वधूः ।
कर्णालंकृतिपद्मरागशकलं विन्यस्य चञ्चूपुटे
व्रीडार्ता प्रकरोति दाडिमफलव्याजेन वाग्बन्धनम् ॥
स्तत्प्रातर्गुरुसंनिधौ निगदतस्तस्योपहारं वधूः ।
कर्णालंकृतिपद्मरागशकलं विन्यस्य चञ्चूपुटे
व्रीडार्ता प्रकरोति दाडिमफलव्याजेन वाग्बन्धनम् ॥
अन्वयः
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निशि दम्पत्योः जल्पतोः यत् वचः गृह-शुकेन आकर्णितम्, तत् प्रातः गुरु-संनिधौ निगदतः तस्य चञ्चू-पुटे कर्ण-अलंकृति-पद्मराग-शकलं विन्यस्य वधूः व्रीडा-आर्ता (सती) दाडिम-फल-व्याजेन वाक्-बन्धनं प्रकरोति ।
Summary
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A pet parrot overhears a couple's intimate talk at night and starts repeating it in the morning in front of the elders. The embarrassed bride cleverly silences it by placing a piece of a ruby from her earring into its beak, pretending it's a pomegranate seed.
पदच्छेदः
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| दम्पत्योः | दम्पती (६.२) | of the couple |
| निशि | निशा (७.१) | at night |
| जल्पतोः | जल्पत् (√जल्प्+शतृ, ६.२) | while talking |
| गृह | गृह | house |
| शुकेन | शुक (३.१) | by the parrot |
| आकर्णितम् | आकर्णित (आ√कर्ण्+क्त, १.१) | was overheard |
| यत् | यद् (१.१) | which |
| वचः | वचस् (१.१) | speech |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| प्रातः | प्रातर् | in the morning |
| गुरु | गुरु | elders |
| संनिधौ | संनिधि (७.१) | in the presence of |
| निगदतः | निगदत् (नि√गद्+शतृ, ६.१) | of it repeating |
| तस्य | तद् (६.१) | its |
| उपहारम् | उपहार (२.१) | a gift (bribe) |
| वधूः | वधू (१.१) | the bride |
| कर्ण | कर्ण | ear |
| अलंकृति | अलंकृति | ornament's |
| पद्मराग | पद्मराग | ruby |
| शकलं | शकल (२.१) | a piece of |
| विन्यस्य | विन्यस्य (वि+नि√अस्+ल्यप्) | having placed |
| चञ्चू | चञ्चू | beak |
| पुटे | पुट (७.१) | in the cavity of the |
| व्रीडा | व्रीडा | with shame |
| आर्ता | आर्त (१.१) | afflicted |
| प्रकरोति | प्रकरोति (प्र√कृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | performs |
| दाडिम | दाडिम | pomegranate |
| फल | फल | fruit |
| व्याजेन | व्याज (३.१) | under the pretext of a |
| वाक् | वाच् | speech |
| बन्धनम् | बन्धन (२.१) | the binding of |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द | म्प | त्यो | र्नि | शि | ज | ल्प | तो | र्गृ | ह | शु | के | ना | क | र्णि | तं | य | द्व | च |
| स्त | त्प्रा | त | र्गु | रु | सं | नि | धौ | नि | ग | द | त | स्त | स्यो | प | हा | रं | व | धूः |
| क | र्णा | लं | कृ | ति | प | द्म | रा | ग | श | क | लं | वि | न्य | स्य | च | ञ्चू | पु | टे |
| व्री | डा | र्ता | प्र | क | रो | ति | दा | डि | म | फ | ल | व्या | जे | न | वा | ग्ब | न्ध | नम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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