कथमपि सखि क्रीडाकोपाद्व्रजेति मयोदिते
कठिनहृदयस्त्यक्त्वा शय्यां बलाद्गत एव सः ।
इति सरभसं ध्वस्तप्रेम्णि व्यपेतघृणे जने
पुनरपि हतव्रीडं चेतः प्रयाति करोमि किम् ॥
कथमपि सखि क्रीडाकोपाद्व्रजेति मयोदिते
कठिनहृदयस्त्यक्त्वा शय्यां बलाद्गत एव सः ।
इति सरभसं ध्वस्तप्रेम्णि व्यपेतघृणे जने
पुनरपि हतव्रीडं चेतः प्रयाति करोमि किम् ॥
कठिनहृदयस्त्यक्त्वा शय्यां बलाद्गत एव सः ।
इति सरभसं ध्वस्तप्रेम्णि व्यपेतघृणे जने
पुनरपि हतव्रीडं चेतः प्रयाति करोमि किम् ॥
अन्वयः
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सखि, क्रीडा-कोपात् 'व्रज' इति मया कथमपि उदिते, सः कठिन-हृदयः शय्यां त्यक्त्वा बलात् गतः एव । इति सरभसं ध्वस्त-प्रेम्णि व्यपेत-घृणे जने, हत-व्रीडं चेतः पुनः अपि प्रयाति, किं करोमि?
Summary
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A woman laments: "Friend, when I somehow said 'Go!' in a fit of playful anger, that hard-hearted man actually left the bed and went away. Now my shameless heart wants to go back to that cruel, loveless person. What can I do?"
पदच्छेदः
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| कथमपि | कथमपि | somehow |
| सखि | सखी (८.१) | O friend |
| क्रीडा | क्रीडा | playful |
| कोपात् | कोप (५.१) | from anger |
| व्रज | व्रज (√व्रज् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | go |
| इति | इति | thus |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| उदिते | उदित (√वद्+क्त, ७.१) | having been said |
| कठिन | कठिन | hard |
| हृदयः | हृदय (१.१) | hearted |
| त्यक्त्वा | त्यक्त्वा (√त्यज्+क्त्वा) | having left |
| शय्याम् | शय्या (२.१) | the bed |
| बलात् | बल (५.१) | forcefully/actually |
| गतः | गत (√गम्+क्त, १.१) | went |
| एव | एव | indeed |
| सः | तद् (१.१) | he |
| इति | इति | thus |
| सरभसम् | सरभसम् | impetuously |
| ध्वस्त | ध्वस्त (√ध्वंस्+क्त) | destroyed |
| प्रेम्णि | प्रेमन् (७.१) | whose love is |
| व्यपेत | व्यपेत (वि+अप√इ+क्त) | devoid of |
| घृणे | घृणा (७.१) | pity |
| जने | जन (७.१) | towards that person |
| पुनः | पुनर् | again |
| अपि | अपि | even |
| हत | हत (√हन्+क्त) | shameless |
| व्रीडम् | व्रीड (१.१) | (whose shame is destroyed) |
| चेतः | चेतस् (१.१) | my heart |
| प्रयाति | प्रयाति (प्र√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | goes |
| करोमि | करोमि (√कृ कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | do I do |
| किम् | किम् (२.१) | what |
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | थ | म | पि | स | खि | क्री | डा | को | पा | द्व्र | जे | ति | म | यो | दि | ते |
| क | ठि | न | हृ | द | य | स्त्य | क्त्वा | श | य्यां | ब | ला | द्ग | त | ए | व | सः |
| इ | ति | स | र | भ | सं | ध्व | स्त | प्रे | म्णि | व्य | पे | त | घृ | णे | ज | ने |
| पु | न | र | पि | ह | त | व्री | डं | चे | तः | प्र | या | ति | क | रो | मि | किम् |
| न | स | म | र | स | ल | ग | ||||||||||
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