चक्षुःप्रीतिप्रसक्ते मनसि परिचये चिन्त्यमानाभ्युपाये
रागे यातेऽतिभूमिं विकसति सुतरां गोचरे दूतिकायाः ।
आस्तां दूरेण तावत्सरभसदयितालिङ्गनानन्दलाभ-
स्तद्गेहोपान्तरथ्याभ्रमणमपि परां निर्वृतिं संतनोति ॥
चक्षुःप्रीतिप्रसक्ते मनसि परिचये चिन्त्यमानाभ्युपाये
रागे यातेऽतिभूमिं विकसति सुतरां गोचरे दूतिकायाः ।
आस्तां दूरेण तावत्सरभसदयितालिङ्गनानन्दलाभ-
स्तद्गेहोपान्तरथ्याभ्रमणमपि परां निर्वृतिं संतनोति ॥
रागे यातेऽतिभूमिं विकसति सुतरां गोचरे दूतिकायाः ।
आस्तां दूरेण तावत्सरभसदयितालिङ्गनानन्दलाभ-
स्तद्गेहोपान्तरथ्याभ्रमणमपि परां निर्वृतिं संतनोति ॥
अन्वयः
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मनसि चक्षुः-प्रीति-प्रसक्ते (सति), परिचये चिन्त्यमान-अभ्युपाये (सति), रागे अति-भूमिम् याते (सति), दूतिकायाः गोचरे सुतराम् विकसति (सति), तावत् सरभस-दयिता-आलिङ्गन-आनन्द-लाभः दूरेण आस्ताम् । तत्-गेह-उप-अन्त-रथ्या-भ्रमणम् अपि पराम् निर्वृतिम् संतनोति ।
Summary
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When the mind is attached through love at first sight, when means of meeting are being considered as acquaintance grows, and when passion reaches its peak through a messenger, let the joy of a passionate embrace be a distant thought. For now, even just wandering the street near her house bestows supreme bliss.
पदच्छेदः
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| चक्षुःप्रीतिप्रसक्ते | चक्षुस्–प्रीति–प्रसक्त (७.१) | when attached to love born from sight |
| मनसि | मनस् (७.१) | in the mind |
| परिचये | परिचय (७.१) | when acquaintance (is established) |
| चिन्त्यमानाभ्युपाये | चिन्त्यमान (√चिन्त्+यक्+शानच्)–अभ्युपाय (७.१) | when means (of meeting) are being thought of |
| रागे | राग (७.१) | when passion |
| याते | यात (√या+क्त, ७.१) | has gone |
| अतिभूमिम् | अतिभूमि (२.१) | to an extreme degree |
| विकसति | विकसत् (वि√कस्+शतृ, ७.१) | when it develops |
| सुतराम् | सुतराम् | exceedingly |
| गोचरे | गोचर (७.१) | within the range |
| दूतिकायाः | दूतिका (६.१) | of the female messenger |
| आस्ताम् | आस्ताम् (√आस् कर्तरि लोट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | let it be |
| दूरेण | दूरेण | far away |
| तावत् | तावत् | for now |
| सरभसदयितालिङ्गनानन्दलाभः | सरभस–दयिता–आलिङ्गन–आनन्द–लाभ (१.१) | the attainment of the joy of passionately embracing the beloved |
| तद्गेहोपान्तरथ्याभ्रमणम् | तद्–गेह–उपान्त–रथ्या–भ्रमण (१.१) | wandering the street near her house |
| अपि | अपि | even |
| पराम् | परा (२.१) | supreme |
| निर्वृतिम् | निर्वृति (२.१) | bliss |
| संतनोति | संतनोति (सम्√तन् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | bestows |
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| च | क्षुः | प्री | ति | प्र | स | क्ते | म | न | सि | प | रि | च | ये | चि | न्त्य | मा | ना | भ्यु | पा | ये |
| रा | गे | या | ते | ऽति | भू | मिं | वि | क | स | ति | सु | त | रां | गो | च | रे | दू | ति | का | याः |
| आ | स्तां | दू | रे | ण | ता | व | त्स | र | भ | स | द | यि | ता | लि | ङ्ग | ना | न | न्द | ला | भ |
| स्त | द्गे | हो | पा | न्त | र | थ्या | भ्र | म | ण | म | पि | प | रां | नि | र्वृ | तिं | सं | त | नो | ति |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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