अन्वयः
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कौन्तेय! रजः रागात्मकम् तृष्णासङ्गसमुद्भवम् विद्धि । तत् देहिनम् कर्मसङ्गेन निबध्नाति ।
Summary
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O son of Kunti, know that Rajas is of the nature of passion, arising from craving and attachment. It binds the embodied soul through attachment to action.
सारांश
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हे कौन्तेय! रजोगुण को राग रूप और तृष्णा व आसक्ति से उत्पन्न जानो। वह जीवात्मा को कर्मों और उनके फलों की आसक्ति में बाँधता है।
पदच्छेदः
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| रजः | रजस् (१.१) | Rajas |
| रागात्मकम् | राग–आत्मक (२.१) | as being of the nature of passion |
| विद्धि | विद्धि (√विद् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | know |
| तृष्णासङ्गसमुद्भवम् | तृष्णा–सङ्ग–समुद्भव (सम्+उद्√भू+अप्, २.१) | arising from craving and attachment |
| तत् | तद् (१.१) | It |
| निबध्नाति | निबध्नाति (नि√बन्ध् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | binds |
| कौन्तेय | कौन्तेय (८.१) | O son of Kunti |
| कर्मसङ्गेन | कर्मन्–सङ्ग (३.१) | by attachment to action |
| देहिनम् | देहिन् (२.१) | the embodied soul |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| र | जो | रा | गा | त्म | कं | वि | द्धि |
| तृ | ष्णा | स | ङ्ग | स | मु | द्भ | वम् |
| त | न्नि | ब | ध्ना | ति | कौ | न्ते | य |
| क | र्म | स | ङ्गे | न | दे | हि | नम् |
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