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हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥

अन्वयः AI (श्रीभगवान् उवाच) हन्त! कुरुश्रेष्ठ! ते दिव्याः आत्मविभूतयः प्राधान्यतः कथयिष्यामि । हि मे विस्तरस्य अन्तः न अस्ति ।
Summary AI (The Blessed Lord said:) Yes, O best of the Kurus, I will now tell you of My divine glories, but only the most prominent ones, for there is no end to the extent of My manifestations.
सारांश AI श्रीभगवान बोले—हे कुरुश्रेष्ठ! अब मैं तुम्हें अपनी मुख्य दिव्य विभूतियों के बारे में बताऊंगा, क्योंकि मेरे विस्तार का कोई अंत नहीं है।
पदच्छेदः AI
हन्तहन्त Yes
तेयुष्मद् (४.१) to you
कथयिष्यामिकथयिष्यामि (√कथ कर्तरि लृट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) I will tell
दिव्याःदिव्य (२.३) divine
हिहि indeed
आत्मविभूतयःआत्मन्विभूति (२.३) My own glories
प्राधान्यतःप्राधान्यतस् the prominent ones
कुरुश्रेष्ठकुरुश्रेष्ठ (८.१) O best of the Kurus
not
अस्तिअस्ति (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) there is
अन्तःअन्त (१.१) end
विस्तरस्यविस्तर (६.१) of the extent
मेअस्मद् (६.१) My
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
न्त ते यि ष्या मि
दि व्या ह्या त्म वि भू यः
प्रा धा न्य तः कु रु श्रे ष्ठ
ना स्त्य न्तो वि स्त स्य मे
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