विधृते दिवा सवयसा च पुरः
परिपूर्णमण्डलविकाशभृति ।
हिमधाम्नि दर्पणतले च मुहुः
स्वमुखश्रियं मृगदृशो ददृशुः ॥
विधृते दिवा सवयसा च पुरः
परिपूर्णमण्डलविकाशभृति ।
हिमधाम्नि दर्पणतले च मुहुः
स्वमुखश्रियं मृगदृशो ददृशुः ॥
परिपूर्णमण्डलविकाशभृति ।
हिमधाम्नि दर्पणतले च मुहुः
स्वमुखश्रियं मृगदृशो ददृशुः ॥
मल्लिनाथः
विधृत इति ॥ दिवा आकाशेन सवयसा वयस्यया च पुरोऽग्रे विधृते विधारिते परिपूर्णमण्डलविकाशं बिम्बशोभां बिभर्तीति तद्भृत तस्मिन् हिमधानि चन्द्रे दर्पणतले च मृगदृशः स्त्रियः स्वमुखश्रियम् । पूर्वत्रोपमानभूतामुत्तरत्रोपमेयभूतां&#३२; चेत्यर्थः । मुहुर्ददृशुः । औपम्यपरीक्षार्थमिति भावः । अत्रान्यश्रियोऽन्यत्रासंभवाच्चन्द्रे तत्सदृशीमिति सादृश्याक्षेपादसंभवद्वस्तुसंबन्धा निदर्शना । तथा चन्द्र दर्पणयोर्द्युसवयसोश्च यथासंख्यमन्वयाद्यथासंख्यालंकारश्च । तदुभयापेक्षया चन्द्रदर्शनयोर्मुखश्रीदर्शनस्थानत्वेन प्रस्तुतयोरेवौपम्यस्य गम्यत्वात्तुल्ययोगितेति संकरः
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | धृ | ते | दि | वा | स | व | य | सा | च | पु | रः |
| प | रि | पू | र्ण | म | ण्ड | ल | वि | का | श | भृ | ति |
| हि | म | धा | म्नि | द | र्प | ण | त | ले | च | मु | हुः |
| स्व | मु | ख | श्रि | यं | मृ | ग | दृ | शो | द | दृ | शुः |
| स | ज | स | स | ||||||||
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