मल्लिनाथः
कदलीति ॥ वधूः कदलीप्रकाण्डरुचिरे रम्भास्तम्भसुन्दरे । उरुरेव तरुर्बन्धनवृक्षो यस्मिन् । अत्र कदलीकाण्डस्य सौन्दर्यमानोपमानत्वान्न बन्धनयोग्यवृक्ष वाचिना तरुशब्देन पुनरुक्तिः । महति जघनस्थल्येव परिसरः प्रदेशस्तस्मिन् रशनाकलापक एव गुणस्तेन मकरध्वजो मदनः स एव द्विरदस्तमाकलयदबध्नात् । रशनाबन्धेन जघनमतीव मदनोद्दीपकमासीदित्यर्थः । समस्तवस्तुवर्ति सावयवरूपकम्
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | द | ली | प्र | का | ण्ड | रु | चि | रो | रु | त | रौ |
| ज | घ | न | स्थ | ली | प | रि | स | रे | म | ह | ति |
| र | श | ना | क | ला | प | क | गु | णे | न | व | धू |
| र्म | क | र | ध्व | ज | द्वि | र | द | मा | क | ल | यत् |
| स | ज | स | स | ||||||||
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