मल्लिनाथः
इतीति ॥ इत्येवं सितदीधितावुदयवति अबलाः स्त्रियो निश्चिता प्रियतमानामागतिरागमनं याभिस्ताः सत्यः प्रतिकर्म प्रसाधनं कर्तुमुपचक्रमिरे । `प्रतिकर्म प्रसाधनम्` इत्यमरः । चन्द्रोदयात् प्रियागमनं निश्चित्य अलंकर्तुं प्रक्रान्ता इत्यर्थः । तथा हि—समये कार्यकाले कृतमनुष्ठितं सर्वं कर्म उपकार्युपकारकं भवति । अन्यथा विफलमेवेति भावः । अतो निश्चित्य प्रवृत्तिरासां युक्तेत्यर्थान्तरन्यासः
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | नि | श्चि | त | प्रि | य | त | मा | ग | त | यः |
| सि | त | दी | धि | ता | व | द | य | व | त्य | ब | लाः |
| प्र | ति | क | र्म | क | र्तु | मु | च | क्र | मि | रे | |
| स | म | ये | हि | स | र्व | मु | प | का | रि | कृ | तम् |
| स | ज | स | स | ||||||||
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