मल्लिनाथः
रजनीमिति ॥ शशी रजनीमवाप्य रुचं शोभामाप । असौ शश्यपि तां रजनी सपदि व्यभूषयत् । महतां सतां चरितमविलम्बितक्रमं यथा तथा इतरेतरोपकृतिमत् अन्योन्योपकारवत् अहो इत्यविलम्बादाश्चर्यम् । अत्र रजनीशशिनोर्मिथःशोभाकरत्वादन्योन्यालंकारः। `तदन्योन्यं मिथो यत्रोत्पाद्योत्पादकता भवेत्` इति लक्षणात् । तत्समर्थकश्वायमर्थान्तरन्यास इत्यङ्गाङ्गिभावेन संकरः
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| र | ज | नी | म | वा | प्य | रु | च | मा | प | श | शी |
| स | प | दि | व्य | भू | ष | य | द | सा | व | पि | ताम् |
| अ | वि | ल | म्बि | त | क्र | म | म | हो | म | ह | ता |
| मि | त | रे | त | र | कृ | ति | म | च्च | रि | तम् | |
| स | ज | स | स | ||||||||
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