श्लक्ष्णं यत्परिहितमेतयोः किलान्त-
र्धानार्थं तदुकसेकसक्तमूर्वोः ।
नारीणां विमलतरौ समुल्लसन्त्या
भासन्तर्दधतुरुरूदुकूलमेव ॥
श्लक्ष्णं यत्परिहितमेतयोः किलान्त-
र्धानार्थं तदुकसेकसक्तमूर्वोः ।
नारीणां विमलतरौ समुल्लसन्त्या
भासन्तर्दधतुरुरूदुकूलमेव ॥
र्धानार्थं तदुकसेकसक्तमूर्वोः ।
नारीणां विमलतरौ समुल्लसन्त्या
भासन्तर्दधतुरुरूदुकूलमेव ॥
मल्लिनाथः
श्लक्ष्णमिति ॥ एतयोरूर्वोरन्तर्धानार्थं किल छादनार्थं श्लक्ष्णं स्निग्धं यद्दुकूलं परिहितमाच्छादितमुदकसेकेन संसक्तं संसृष्टं तत् दुकूलं कर्म । विमलतरौ नारीणा मुरू पीवरावूरू एव कर्तारौ समुल्लसन्त्या स्फुरन्त्या भासा निजकान्त्याऽन्तर्दधतुः छादितवन्तौ । तदेतद्भूषणमिति भावः । अत्र दुकूलस्योरूच्छादकत्वेऽपि तदभावोक्तेरसंबन्धेऽपि संबन्धरूपातिशयोक्तिः । तदपेक्षया चोर्वोर्दुकूलानाच्छादकयोराच्छादकत्वोक्तेरसंबन्धे संबन्धरूपातिशयोक्त्यानुप्राणितेति सजातीयसंकरः, तदनुप्राणितश्च विषमालंकार इति विजातीयसंकरः । तेन चोर्वोर्लोकोत्तरं लावण्यं व्यज्यत इत्यलंकारेण वस्तुध्वनिः
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्ल | क्ष्णं | य | त्प | रि | हि | त | मे | त | योः | कि | ला | न्त |
| र्धा | ना | र्थं | त | दु | क | से | क | स | क्त | मू | र्वोः | |
| ना | री | णां | वि | म | ल | त | रौ | स | मु | ल्ल | स | न्त्या |
| भा | स | न्त | र्द | ध | तु | रु | रू | दु | कू | ल | मे | व |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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