आबद्धप्रचुरपरार्घ्यकिङ्किणीको
रामाणामनवरतोदगाहभाजाम् ।
नारावं व्यतनुत मेखलाकलापः
कस्मिन्वा सजलगुणे गिरां पटुत्वम् ॥
आबद्धप्रचुरपरार्घ्यकिङ्किणीको
रामाणामनवरतोदगाहभाजाम् ।
नारावं व्यतनुत मेखलाकलापः
कस्मिन्वा सजलगुणे गिरां पटुत्वम् ॥
रामाणामनवरतोदगाहभाजाम् ।
नारावं व्यतनुत मेखलाकलापः
कस्मिन्वा सजलगुणे गिरां पटुत्वम् ॥
मल्लिनाथः
आबद्धेति ॥ उदकस्य गाहोऽवगाहनं उदगाहः । `मन्थौदन-` (अष्टाध्यायी ६.३.६० ) इत्यादिनोदादेशः । तमनवरतं भजन्ति यास्तासामनवरतोदगाहभाजां रामाणां स्त्रीणां संबन्धी आबद्धाः प्रोताः प्रचुरा भूयिष्ठाः परार्ध्याः श्रेष्ठाश्च किंकिण्यो यस्मिन् स तथोक्तः । `नद्यृतश्च` (अष्टाध्यायी ५.४.१५३ ) इति कप् । मेखलाकलाप आरावं ध्वनिं न व्यतनुत । तथा हि—जलेन सह सजलो जलार्द्रो गुणः सूत्रं यस्य सः । तथा डलयोरभेदाज्जडगुणो जडधर्मो जाड्यं तेन सहेति सजडगुणो जडश्च तस्मिन् कस्मिन्वा मेखलाकलापे पुंसि वा गिरां वाचां, ध्वनीनां च पटुत्वं सामर्थ्यम् । न कुत्रापीत्यर्थः । श्लेषमूलाभेदातिशयोक्त्यनुप्राणितोऽयमर्थान्तरन्यासः
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | ब | द्ध | प्र | चु | र | प | रा | र्घ्य | कि | ङ्कि | णी | को |
| रा | मा | णा | म | न | व | र | तो | द | गा | ह | भा | जाम् |
| ना | रा | वं | व्य | त | नु | त | मे | ख | ला | क | ला | पः |
| क | स्मि | न्वा | स | ज | ल | गु | णे | गि | रां | प | टु | त्वम् |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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