रागान्धीकृतनयनेन नामधेय-
व्यत्यासादभिमुखमीरितः प्रियेण ।
मानिन्या वपुषि पतन्निसर्गमन्दो
भिन्दानो हृदयमसाहि नोदवज्रः ॥
रागान्धीकृतनयनेन नामधेय-
व्यत्यासादभिमुखमीरितः प्रियेण ।
मानिन्या वपुषि पतन्निसर्गमन्दो
भिन्दानो हृदयमसाहि नोदवज्रः ॥
व्यत्यासादभिमुखमीरितः प्रियेण ।
मानिन्या वपुषि पतन्निसर्गमन्दो
भिन्दानो हृदयमसाहि नोदवज्रः ॥
मल्लिनाथः
रागेति ॥ रागेण विपक्षानुरागेणान्धीकृतनयनेन प्रियेण नामधेयव्यत्यासाद्विपक्षनामपूर्वकमभिमुखमीरितः क्षिप्तो वपुषि पतन्निसर्गमन्दः स्वभावजडः तथापि हृदयं भिन्दानो विदारयन्नुदकमेव वज्रोऽशनिरुदवज्रः । `मन्थौदन-` (अष्टाध्यायी ६.३.६० ) इत्यादिना विकल्पादुदादेशः । मानिन्या विपक्षनामग्रहणजनितकोपवत्या नायिकया नासाहि न सोढः । तीक्ष्णयोगादतीक्ष्णमपि तीक्ष्णं भवतीति भावः । उदवज्र इति केवलनिरवयवरूपकम्
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | गा | न्धी | कृ | त | न | य | ने | न | ना | म | धे | य |
| व्य | त्या | सा | द | भि | मु | ख | मी | रि | तः | प्रि | ये | ण |
| मा | नि | न्या | व | पु | षि | प | त | न्नि | स | र्ग | म | न्दो |
| भि | न्दा | नो | हृ | द | य | म | सा | हि | नो | द | व | ज्रः |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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