कुर्वद्भिमुखरुचिमुज्जवलामजस्रं
यैस्तोयैरसिचत वल्लभां विलासी ।
तैरेव प्रतियुवतेरकारि दूरा-
त्कालुष्यं शशधरदीधितिच्छटाच्छैः ॥
कुर्वद्भिमुखरुचिमुज्जवलामजस्रं
यैस्तोयैरसिचत वल्लभां विलासी ।
तैरेव प्रतियुवतेरकारि दूरा-
त्कालुष्यं शशधरदीधितिच्छटाच्छैः ॥
यैस्तोयैरसिचत वल्लभां विलासी ।
तैरेव प्रतियुवतेरकारि दूरा-
त्कालुष्यं शशधरदीधितिच्छटाच्छैः ॥
मल्लिनाथः
कुर्वद्भिरिति ॥ मुखरुचिं मुखकान्तिं उज्वलां कुर्वद्भिर्यैस्तोयैर्विलासी विलसनशीलः कामी । `वौ कषलस-` (अष्टाध्यायी ३.२.१४३ ) इत्यादिना घिनुण् प्रत्ययः । वल्लभामजस्रमसिचत सिक्तवान् । स्वरितेत्त्वादात्मनेपदम् । `आत्मनेपदेष्वन्यतरस्याम्` (अष्टाध्यायी २.४.४४ ) इति सिञ्चतेर्लुङि च्लेरङादेशः । शशधरदीधितिच्छटाच्छैः शशिकरनिकरस्वच्छैः तैरेव तोयैर्दूरात्प्रतियुवतेः सपत्न्याः कालुष्यमाविलत्वं, वैवर्ण्यं चाकारि । स्वच्छतोयैः कालुष्यं कृतमिति विरुद्धकार्योत्पत्तिरूपो विषमभेदः । तच्चान्यत्रेत्यसंगतिः वैवर्ण्यकालुष्ययोरभेदाध्यवसायादतिशयोक्तिस्तदुत्थापितेति संकरः
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कु | र्व | द्भि | मु | ख | रु | चि | मु | ज्ज | व | ला | म | ज | स्रं |
| यै | स्तो | यै | र | सि | च | त | व | ल्ल | भां | वि | ला | सी | |
| तै | रे | व | प्र | ति | यु | व | ते | र | का | रि | दू | रा | |
| त्का | लु | ष्यं | श | श | ध | र | दी | धि | ति | च्छ | टा | च्छैः | |
| म | न | ज | र | ग | |||||||||
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