कान्तानां कुवलयमप्यपास्तमक्ष्णोः
शोभाभिर्न मुखरुचाहमेकमेव ।
संहर्षादलिविरुतैरितीव गाय-
ल्लोलोर्मौ पयसि महोत्पलं ननर्त ॥
कान्तानां कुवलयमप्यपास्तमक्ष्णोः
शोभाभिर्न मुखरुचाहमेकमेव ।
संहर्षादलिविरुतैरितीव गाय-
ल्लोलोर्मौ पयसि महोत्पलं ननर्त ॥
शोभाभिर्न मुखरुचाहमेकमेव ।
संहर्षादलिविरुतैरितीव गाय-
ल्लोलोर्मौ पयसि महोत्पलं ननर्त ॥
मल्लिनाथः
कान्तानामिति ॥ लोलोर्मौ चपलोर्मिणि । `तृतीयादिषु भाषितपुंस्कं पुंवद्गालवस्य` (अष्टाध्यायी ७.१.७४ ) इति विकल्पात्पुंवद्भावः । पयसि महोत्पलमरविन्दं कर्तृ । `अरविन्दं महोत्पलम्` इत्यमरः । कान्तानां मुखरुचाऽहमेकमेव नापास्तं, किंतु तासामक्ष्णोः शोभाभिः कुवलयमप्यपास्तमिति संहर्षात्संतोषाद्धेतोरलिविरुतैर्गायत् । अलिरुतरूपं गानं कुर्वदिति रूपकम् । `इत्थंभूतलक्षणे` (अष्टाध्यायी २.३.२१ ) इति तृतीया । ननर्तेव । `न दुःखं पञ्चभिः सह` इति न्यायान्नृत्यति स्म । अत्रोर्मिचलनहेतुके महोत्पलचलने अलिनादसंहर्षहेतुकसमाननृत्यत्वोत्प्रेक्षणात् क्रियानिमित्ता क्रियास्वरूपोत्प्रेक्षा वाच्या
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| का | न्ता | नां | कु | व | ल | य | म | प्य | पा | स्त | म | क्ष्णोः |
| शो | भा | भि | र्न | मु | ख | रु | चा | ह | मे | क | मे | व |
| सं | ह | र्षा | द | लि | वि | रु | तै | रि | ती | व | गा | य |
| ल्लो | लो | र्मौ | प | य | सि | म | हो | त्प | लं | न | न | र्त |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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