नेच्छन्ती सममुना सरोऽवगाढुं
रोधस्तः प्रतिजलमीरिता सखीभिः ।
आश्लक्षद्भयचकितेक्षणं नवोढा
वोढारं विपदि न दूषितातिभूमिः ॥
नेच्छन्ती सममुना सरोऽवगाढुं
रोधस्तः प्रतिजलमीरिता सखीभिः ।
आश्लक्षद्भयचकितेक्षणं नवोढा
वोढारं विपदि न दूषितातिभूमिः ॥
रोधस्तः प्रतिजलमीरिता सखीभिः ।
आश्लक्षद्भयचकितेक्षणं नवोढा
वोढारं विपदि न दूषितातिभूमिः ॥
मल्लिनाथः
नेच्छन्तीति ॥ अमुना सममनेन भर्त्रा सह सरोऽवगाढुमवगाहितुम् । `स्वरतिसूतिसूयतिधूञूदितो वा` (अष्टाध्यायी ७.२.४४ ) इति विकल्पान्नेडागमः। नेच्छन्ती लज्जयाऽनिच्छन्ती । नञर्थस्य नशब्दस्य सुप्सुपेति समासः । अनञ्समासो वा । अथ सखीभिः प्रतिजलं जलं प्रति रोधस्तो रोधसः । पञ्चम्यास्तसिल् । ईरिता नुन्ना नवोढा नववधूः भयेन चकितेक्षणं संभ्रान्तदृष्टि यथा तथा वोढारं भर्तारमाश्लिक्षदालिङ्गितवती । `श्लिष आलिङ्गने` इति धातोर्लुङि च्लेः क्सादेशः । न च धार्यदोषापत्तिरित्याह । विपदि विपत्तौ अतिक्रान्ता भूमिरतिभूमिरमर्यादा न दूषिता । `आपत्काले नास्ति मर्यादा` इति न्यायादिति भावः । अर्थान्तरन्यासालंकारः
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ने | च्छ | न्ती | स | म | मु | ना | स | रो | ऽव | गा | ढुं | |
| रो | ध | स्तः | प्र | ति | ज | ल | मी | रि | ता | स | खी | भिः |
| आ | श्ल | क्ष | द्भ | य | च | कि | ते | क्ष | णं | न | वो | ढा |
| वो | ढा | रं | वि | प | दि | न | दू | षि | ता | ति | भू | मिः |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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