स्फुचमिदमभिचारमन्त्र एव
प्रतियुवतेरभिधानमङ्गनानाम् ।
वरतनुरमुनोपहूय पत्या
मृदुकुसुमेन यदाहताप्यमूर्च्छत् ॥
स्फुचमिदमभिचारमन्त्र एव
प्रतियुवतेरभिधानमङ्गनानाम् ।
वरतनुरमुनोपहूय पत्या
मृदुकुसुमेन यदाहताप्यमूर्च्छत् ॥
प्रतियुवतेरभिधानमङ्गनानाम् ।
वरतनुरमुनोपहूय पत्या
मृदुकुसुमेन यदाहताप्यमूर्च्छत् ॥
मल्लिनाथः
स्फुटमिति ॥ इदं प्रतियुवतेः सपत्न्या अभिधानं नामधेयं अङ्गनानामभिचारः परमारणकर्म । यथा `श्येनेनाभिचरन् यजेत` इति तस्य मन्त्रोऽभिचारमन्त्रः स एव स्फुटमित्युत्प्रेक्षा । यद्यस्माद्वरतनुः स्त्री पत्या भर्त्रा अमुना सपत्नीनामधेयेनोपहूय मृदुकुसुमेन । मृदुग्रहणमचिरावचितत्वं द्योतयन् देवताभिचारमन्त्राणामनादि संस्कारभावं द्योतयति । तेनाप्याहता अमूर्च्छत् । यदुच्चारणपूर्वकं कुसुमताडनमपि मारकं सोऽभिचारमन्त्र एव सत्यम् । अन्यथा केवलकुसुमेऽपि तत्प्रसङ्गादित्यर्थः
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्फु | च | मि | द | म | भि | चा | र | म | न्त्र | ए | व | |
| प्र | ति | यु | व | ते | र | भि | धा | न | म | ङ्ग | ना | नाम् |
| व | र | त | नु | र | मु | नो | प | हू | य | प | त्या | |
| मृ | दु | कु | सु | मे | न | य | दा | ह | ता | प्य | मू | र्च्छत् |
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