विलसितमनुकुर्वती पुरस्ता-
द्धरणिरुहाधिरुहो वधूर्लतायाः ।
रमणमृजुतया पुरः सखीना-
मकलितचापलदोषमालिलिङ्ग ॥
विलसितमनुकुर्वती पुरस्ता-
द्धरणिरुहाधिरुहो वधूर्लतायाः ।
रमणमृजुतया पुरः सखीना-
मकलितचापलदोषमालिलिङ्ग ॥
द्धरणिरुहाधिरुहो वधूर्लतायाः ।
रमणमृजुतया पुरः सखीना-
मकलितचापलदोषमालिलिङ्ग ॥
मल्लिनाथः
विलसितमिति ॥ वधूः काचित् स्त्री पुरस्तादग्रे धरणिरुहमधिरोहतीति धरणिरुहाधिरुट् वृक्षाधिरूढा । रुहेः क्लिप् । तस्या लताया विलसितं चेष्टितम् । भावे क्तः । अनुकुर्वती एवमित्याश्लेषप्रकारमभिनयन्ती ऋजुतया अकुटिलबुद्धितया सखीनां पुरोऽग्रे अकलितोऽविचारितश्चापलमनुचितकरणमेव दोषो यस्मिन्कर्मणि तद्यथा तथा रमणं प्रियमालिलिङ्ग । एषा हर्षौत्सुक्यवती प्रौढा च
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | ल | सि | त | म | नु | कु | र्व | ती | पु | र | स्ता | |
| द्ध | र | णि | रु | हा | धि | रु | हो | व | धू | र्ल | ता | याः |
| र | म | ण | मृ | जु | त | या | पु | रः | स | खी | ना | |
| म | क | लि | त | चा | प | ल | दो | ष | मा | लि | लि | ङ्ग |
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