अभिमुखपतितैर्गुणप्रकर्षा-
दवजितमुद्धतिमुज्वलां दधानैः ।
तरुकिसलयजालमग्रहस्तैः
प्रसभमनीयत भङ्गमङ्गनानां ॥
अभिमुखपतितैर्गुणप्रकर्षा-
दवजितमुद्धतिमुज्वलां दधानैः ।
तरुकिसलयजालमग्रहस्तैः
प्रसभमनीयत भङ्गमङ्गनानां ॥
दवजितमुद्धतिमुज्वलां दधानैः ।
तरुकिसलयजालमग्रहस्तैः
प्रसभमनीयत भङ्गमङ्गनानां ॥
मल्लिनाथः
अभिमुखेति ॥ अभिमुखपतितैः भञ्जनार्थमभिमुखमागतैः उज्ज्वलामुत्कृष्टामुद्धतिमुपरिप्रसारमौद्धत्यं च दधानैरङ्गनानामग्राणि च ते हस्ताश्चेति समानाधिकरणसमासः । अत एव `हस्ताग्राग्रहस्तयोर्गुणगुणिनोरभेदात्` इति वामनः । तैरग्रहस्तैः कर्तृभिः गुणप्रकर्षाद्धेतोरवजितमवधीरितं तरुकिसलयजालं प्रसभं बलाद्भङ्गं छेदं पराजयं चानीयत नीतम् । `प्रधानकर्मण्याख्येये लादीनाहुर्द्विकर्मणाम्` इति किसलयजालस्य प्राधान्यादभिधानम् । अत्राग्रहस्तेषु विशेषणमहिम्ना जिगीषुत्वस्य किसलयज़ाले जेतव्यत्वस्य च प्रतीतेः समासोक्तिरलंकारः
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | भि | मु | ख | प | ति | तै | र्गु | ण | प्र | क | र्षा | |
| द | व | जि | त | मु | द्ध | ति | मु | ज्व | लां | द | धा | नैः |
| त | रु | कि | स | ल | य | जा | ल | म | ग्र | ह | स्तैः | |
| प्र | स | भ | म | नी | य | त | भ | ङ्ग | म | ङ्ग | ना | नां |
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