गतधृतिरवलम्बितुं बतासू-
ननलमनालपनादहं भवत्याः ।
प्रणयति यदि न प्रसादबुद्धि-
र्भव मम मानिनि जीविते दयालुः ॥
गतधृतिरवलम्बितुं बतासू-
ननलमनालपनादहं भवत्याः ।
प्रणयति यदि न प्रसादबुद्धि-
र्भव मम मानिनि जीविते दयालुः ॥
ननलमनालपनादहं भवत्याः ।
प्रणयति यदि न प्रसादबुद्धि-
र्भव मम मानिनि जीविते दयालुः ॥
मल्लिनाथः
गतेति ॥ गततिरधीराऽहं भवत्यास्तवानालपनादसंभाषणात् । आलपनं विहायेत्यर्थः । ल्यब्लोपे पञ्चमी । असून् प्राणानवलम्बितुं धारयितुमनलमशक्ता । `अलं भूषणपर्याप्तिशक्तिवारणवाचकम्` इत्यमरः । बतेति खेदे । अत एव हे मानिनि, प्रणयिनि प्रिये, प्रसादबुद्धिरनुग्रहबुद्धिर्न यदि नास्ति चेत्तथापि मम जीविते दयालुर्भव । `स्पृहिगृहि-` (अष्टाध्यायी ३.२.१५८ ) इत्यादिना आलुच्प्रत्ययः । स धूर्तोऽपि मत्प्राणत्राणार्थमनुग्राह्य इति भावः
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग | त | धृ | ति | र | व | ल | म्बि | तुं | ब | ता | सू | |
| न | न | ल | म | ना | ल | प | ना | द | हं | भ | व | त्याः |
| प्र | ण | य | ति | य | दि | न | प्र | सा | द | बु | द्धि | |
| र्भ | व | म | म | मा | नि | नि | जी | वि | ते | द | या | लुः |
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