कान्ताजनेन रहसि प्रसभं गृहीत-
केशे रते स्मरसहासवतोपितेन ।
प्रेम्णा मनस्तु रजनीष्वपि हैमनीषु
के शेरते स्म रसहासवतोपितेन ॥
कान्ताजनेन रहसि प्रसभं गृहीत-
केशे रते स्मरसहासवतोपितेन ।
प्रेम्णा मनस्तु रजनीष्वपि हैमनीषु
के शेरते स्म रसहासवतोपितेन ॥
केशे रते स्मरसहासवतोपितेन ।
प्रेम्णा मनस्तु रजनीष्वपि हैमनीषु
के शेरते स्म रसहासवतोपितेन ॥
मल्लिनाथः
&#३२; कान्तेति ॥ सहत इति सहः । पचाद्यच् । स्मरस्य सहः । कामोद्दीपक इत्यर्थः । तेनासवेन तोषितः तेन स्मरसहासवतोषितेन अत एव रसहासावस्य स्त इति रसहासवता रागहास्यवता अत एव प्रेम्णा मनस्सु पुंसां चित्तेपूषितेन वसता । वसतेः कर्तरि क्तः । `वसतिक्षुधोरिद` (अष्टाध्यायी ७.२.५२ ) इतीडागमः `गतिबुद्धि-` (१|४|५२) इत्यादिसूत्रे चकाराद्वर्तमानार्थता । कान्तैव जनस्तेन कान्ताजनेन । जातावेकवचनम् । प्रसभं रहसि बलाद्गृहीतकेशे आकृष्टशिरोरुहे रते सुरते हेमन्ते भवा हैमन्यस्तासु हैमनीष्वपि । द्वाघीयसीष्वपीति भावः। `सर्वत्राण् च तलोपश्च` (अष्टाध्यायी ४.३.२२ ) इति हेमन्तशब्दादण्प्रत्ययः तकारलोपश्च `टिड्ढाणञ्-` (अष्टाध्यायी ४.१.१५ ) इत्यादिना ङीप् । रजनीषु के युवानः शेरते स्म स्वपन्ति स्म । न केऽपीत्यर्थः । `लट् स्मे` (अष्टाध्यायी ३.२.११८ ) इति भूते लट् । एतेनातिभूमिं गतः शृङ्गार इति व्यज्यते । वसन्ततिलका वृत्तम्
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| का | न्ता | ज | ने | न | र | ह | सि | प्र | स | भं | गृ | ही | त |
| के | शे | र | ते | स्म | र | स | हा | स | व | तो | पि | ते | न |
| प्रे | म्णा | म | न | स्तु | र | ज | नी | ष्व | पि | है | म | नी | षु |
| के | शे | र | ते | स्म | र | स | हा | स | व | तो | पि | ते | न |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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