स्फुटमिवोज्वलकाञ्चकान्तिभि-
र्युतमशोकमशोभत चम्पकैः ।
विरहिणां हृदयस्य भिदाभृतः
कपिशितं पिशितं मदनाग्निना ॥
स्फुटमिवोज्वलकाञ्चकान्तिभि-
र्युतमशोकमशोभत चम्पकैः ।
विरहिणां हृदयस्य भिदाभृतः
कपिशितं पिशितं मदनाग्निना ॥
र्युतमशोकमशोभत चम्पकैः ।
विरहिणां हृदयस्य भिदाभृतः
कपिशितं पिशितं मदनाग्निना ॥
मल्लिनाथः
स्फुटमिति ॥ उज्ज्वलकाञ्चनकान्तिभिः शुद्धसुवर्णप्रभैश्चम्पकैर्युतम् । चम्पकसमूहमध्यगतमित्यर्थः । स्फुटं विकचमशोकपुष्पं भिदा भेदः । `षिद्भिदादिभ्योऽङ्` (अष्टाध्यायी ३.३.१०४ ) तां बिभर्ति यत्तस्य भिदाभृतो भिन्नस्य विरहिणां हृदयस्य हृदयपिण्डस्य संबन्धि मदनाग्निना कपिशितं कपिशीकृतं पिशितं मांसमिवाशोभतेत्युप्रेक्षा
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्फु | ट | मि | वो | ज्व | ल | का | ञ्च | का | न्ति | भि | |
| र्यु | त | म | शो | क | म | शो | भ | त | च | म्प | कैः |
| वि | र | हि | णां | हृ | द | य | स्य | भि | दा | भृ | तः |
| क | पि | शि | तं | पि | शि | तं | म | द | ना | ग्नि | ना |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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