मल्लिनाथः
विगतेति ॥ पयोदनभस्वति मेघमारुते वाति वहति सति । वातेर्लटः शत्रादेशः । विगतरागगुणो विरक्तोऽपि को नरो न चलति । सर्वोऽपि चलत्येवेत्यर्थः । एवमलिभिरुच्चकैरुच्चैस्तरामनृतमसत्यं न भवतीत्यननृतं तस्मिन्नननृते सत्यवचनेऽभिहिते सति नवपल्लवैर्ननृत इव नृत्यं कृतमिवेत्युत्प्रेक्षा । नृतेर्भावे लिट्
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | ग | त | रा | ग | गु | णो | ऽपि | ज | नो | न | क |
| श्च | ल | ति | वा | ति | प | यो | द | न | भ | स्व | ति |
| अ | भि | हि | ते | ऽलि | भि | रे | व | मि | वो | च्च | कै |
| र | न | नृ | ते | न | नृ | ते | न | व | प | ल्ल | वैः |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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