मल्लिनाथः
निजेति ॥ प्रियवियुक्तवधूजनचेतसाम् । कर्मणि षष्ठी । अनवनी अरक्षणी । किंतु हन्त्रीत्यर्थः । अवतेः कर्तरि ल्युटि ङीप् । नवनीपवनावलिः नवकदम्बकाननपङ्क्तिः । धृताः पटोपमाः पटकल्पा वारिमुचो मेघा याभिस्ताः । मेघपटावृता&#३२; इत्यर्थः । तासां दिशां निजरजः स्वपरागं पटवासं पिधानमिवेत्युत्प्रेक्षा । अकिरदक्षिपत् । सखीवदिति भावः
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | ज | र | जः | प | ट | वा | स | मि | वा | कि | र |
| द्धृ | त | प | टो | प | म | वा | रि | मु | चां | दि | शां |
| प्रि | य | वि | यु | क्त | व | धू | ज | न | चे | त | सा |
| म | न | व | नी | न | व | नी | प | व | ना | व | लिः |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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