मल्लिनाथः
अनुययाविति ॥ धृतधनुर्वलयस्य तेन्द्रचापमण्डलस्य पयोमुचो मेघस्य संबन्धी शबलस्य भावः शबलिमा विचित्रता । `पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा` (५।१। १२२)। विविधा नानावर्णा उपला मणयो ययोस्तयोः कुण्डलयोर्द्युतिवितानकेन कान्तिपुञ्जेन संवलिता मिलिता अंशवो निजनीलभासो यस्य तत्तथोक्तम् । `शेषाद्विभाषा` (अष्टाध्यायी ५.४.१५४ ) इति कप्प्रत्ययः । बलिमानमुषो बल्यसुराहंकारापहारकस्य हरेर्वपुरनुययावनुचकार । तद्वद्धभावित्यर्थः । उपमालंकारः
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | नु | य | यौ | वि | वि | धो | प | ल | कु | ण्ड | ल |
| द्यु | ति | वि | ता | न | क | सं | व | लि | तां | शु | कम् |
| धु | त | त | नु | र्व | ल | य | स्य | प | यो | मु | चः |
| श | ब | लि | मा | ब | लि | मा | न | मु | षो | व | पुः |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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