मल्लिनाथः
अरुणितेति ॥ अरुणितान्यरुणीकृतान्यखिलानि शैलवनानि यया सा मुहुः पथिकानध्वगान् , विरहिणश्च परितापिनः संतापवतो विदधती उच्चैरेवोच्चकैरु. न्नता । `अव्ययसर्वनाम्नामकच्प्राक्टेः` (अष्टाध्यायी ५.३.७१ ) इत्यकच् प्रत्ययः । विकचा विकसिता या किंशुकसंहतिः पलाशकुसुमराशिः सा दवहव्यवहश्रियं दवाग्निशोभामुदवहत् । निदर्शनालंकारः ॥ इति वसन्तवर्णनम्
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | रु | णि | ता | खि | शै | ल | व | ना | मु | हु | |
| र्वि | द | ध | ती | प | थि | का | न्प | रि | ता | पि | नः |
| वि | क | च | किं | शु | क | सं | ह | ति | रु | च्च | कै |
| रु | द | व | ह | द्द | व | ह | व्य | व | ह | श्रि | यम् |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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