त्रस्तः समस्तजनहासकरः करेणो-
स्तावत्खरः प्रखरमुल्ललयाञ्चकार ।
यावच्चलासनविलोलनितम्बबिम्ब-
विस्रस्तवस्त्रमवरोधवधूः पपात ॥
त्रस्तः समस्तजनहासकरः करेणो-
स्तावत्खरः प्रखरमुल्ललयाञ्चकार ।
यावच्चलासनविलोलनितम्बबिम्ब-
विस्रस्तवस्त्रमवरोधवधूः पपात ॥
स्तावत्खरः प्रखरमुल्ललयाञ्चकार ।
यावच्चलासनविलोलनितम्बबिम्ब-
विस्रस्तवस्त्रमवरोधवधूः पपात ॥
मल्लिनाथः
त्रस्त इति ॥ करेणोरिभ्याः । `करेणुरिभ्यां स्त्री नेभे` इत्यमरः । `भीत्रार्थानां भयहेतुः` (अष्टाध्यायी १.४.२५ ) इत्यपादानत्वम् । त्रस्तो भीत: खरो गर्दभः समस्तजनस्य&#३२; हासं करोतीति तत्करः सन् । `कृञो हेतु-` (अष्टाध्यायी ३.२.२० ) इत्यादिना टप्रत्ययः । तावत्तदवधि प्रखरं भृशमुल्ललयांचकार उत्पपात । यावत् चलात् स्थानचलितादासनात् पल्ययनात् विलोलोऽपसृतस्तस्मान्नितम्बबिम्बाद्विस्रस्तं वस्त्रं यस्मिन्कर्मणि तद्यथा तथा अवरोधवधूः पपात । स्वभावोक्तिः
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्र | स्तः | स | म | स्त | ज | न | हा | स | क | रः | क | रे | णो |
| स्ता | व | त्ख | रः | प्र | ख | र | मु | ल्ल | ल | या | ञ्च | का | र |
| या | व | च्च | ला | स | न | वि | लो | ल | नि | त | म्ब | बि | म्ब |
| वि | स्र | स्त | व | स्त्र | म | व | रो | ध | व | धूः | प | पा | त |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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