अश्रावि भूमिपतिभिः क्षणवीतनिद्रै-
रश्नुन्पुरो हरितकं मुदमादधानः ।
ग्रीवाग्रलोलकलकिङ्गिणीकानिनाद
मिश्रं दधद्दशनचर्चुरशब्दमश्वः ॥
अश्रावि भूमिपतिभिः क्षणवीतनिद्रै-
रश्नुन्पुरो हरितकं मुदमादधानः ।
ग्रीवाग्रलोलकलकिङ्गिणीकानिनाद
मिश्रं दधद्दशनचर्चुरशब्दमश्वः ॥
रश्नुन्पुरो हरितकं मुदमादधानः ।
ग्रीवाग्रलोलकलकिङ्गिणीकानिनाद
मिश्रं दधद्दशनचर्चुरशब्दमश्वः ॥
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | श्रा | वि | भू | मि | प | ति | भिः | क्ष | ण | वी | त | नि | द्रै |
| र | श्नु | न्पु | रो | ह | रि | त | कं | मु | द | मा | द | धा | नः |
| ग्री | वा | ग्र | लो | ल | क | ल | कि | ङ्गि | णी | का | नि | ना | द |
| मि | श्रं | द | ध | द्द | श | न | च | र्चु | र | श | ब्द | म | श्वः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.