जज्ञे जनैर्मुकुलितताक्षमनाददाने
संरब्धहस्तिपकनिष्टुरचोदनाभिः ।
गम्भीरवेदिनि पुरः कवलं करीन्द्रे
मन्दोऽपि नाम न महानवगृह्य साध्यः ॥
जज्ञे जनैर्मुकुलितताक्षमनाददाने
संरब्धहस्तिपकनिष्टुरचोदनाभिः ।
गम्भीरवेदिनि पुरः कवलं करीन्द्रे
मन्दोऽपि नाम न महानवगृह्य साध्यः ॥
संरब्धहस्तिपकनिष्टुरचोदनाभिः ।
गम्भीरवेदिनि पुरः कवलं करीन्द्रे
मन्दोऽपि नाम न महानवगृह्य साध्यः ॥
मल्लिनाथः
जज्ञ इति ॥ गम्भीरं मन्दं वेत्तीति गम्भीरवेदी । त्वग्भेदाच्छोणितस्रावान्मांसस्य च्यवनादपि । आत्मानं यो न जानाति तस्य गम्भीरवेदिता ॥` इति राजपुत्रीये । `चिरकालेन यो वेत्ति शिक्षा परिचितामपि । गम्भीरवेदी विज्ञेयः स गजो गजवेदिभिः ॥` इति मृगचर्मीये । तस्मिन् गम्भीरवेदिनि करीन्द्रे संरब्धः कुपितः हस्तिनं पातीति हस्तिपः स एव हस्तिपको निषादी । `आधोरणा हस्तिपका हस्त्यारोहा निपादिनः` इत्यमरः । तस्य निष्ठुराभिश्चोदनाभिस्तर्जनाभिरपि मुकुलिताक्षं निमीलितनेत्रं यथा तथा पुरः कवलं ग्रासं अनाददाने सति । मन्दो मूढोऽपि । `मूढाल्पापटुनिर्भाग्या` इत्यमरः । गजभेदोऽपि । `भद्रो मन्दो मृगश्चैव विज्ञेयास्त्रिविधा गजाः` इति । महान् बलाधिकोऽवगृह्य निगृह्य साध्यो न नाम न खल्विति जनैर्जज्ञे ज्ञातम् । जानातेः कर्मणि लिद । मन्दोऽपीत्यादिवाक्यार्थः कर्म
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज | ज्ञे | ज | नै | र्मु | कु | लि | त | ता | क्ष | म | ना | द | दा | ने |
| सं | र | ब्ध | ह | स्ति | प | क | नि | ष्टु | र | चो | द | ना | भिः | |
| ग | म्भी | र | वे | दि | नि | पु | रः | क | व | लं | क | री | न्द्रे | |
| म | न्दो | ऽपि | ना | म | न | म | हा | न | व | गृ | ह्य | सा | ध्यः | |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | |||||||||
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