नाभिह्रदैः परिगृहीतरयाणि निम्नैः
सत्रीणांबृहज्जघनसेतुनिवारितानि ।
जग्मुर्जलानि जलमुड्डकवाद्यवल्गु-
वल्गद्धनस्तनतटस्खलितानि मन्दम् ॥
नाभिह्रदैः परिगृहीतरयाणि निम्नैः
सत्रीणांबृहज्जघनसेतुनिवारितानि ।
जग्मुर्जलानि जलमुड्डकवाद्यवल्गु-
वल्गद्धनस्तनतटस्खलितानि मन्दम् ॥
सत्रीणांबृहज्जघनसेतुनिवारितानि ।
जग्मुर्जलानि जलमुड्डकवाद्यवल्गु-
वल्गद्धनस्तनतटस्खलितानि मन्दम् ॥
मल्लिनाथः
नाभीति ॥ स्त्रीणां निम्नैर्गम्भीरैर्नाभिभिरेव हृदैः परिगृहीतरयाणि प्रतिषिद्धवेगानि बृहनिर्जघनैरेव सेतुभिर्निवारितानि । प्रतिहतगतिकानीत्यर्थः । `पश्वान्नितम्बः स्त्रीकट्याः क्लीबे तु जघनं पुरः` इत्यमरः । जलमेव २मैडकवाद्यं वाद्यविशेषः । जलमेकेन पाणिनोत्थापितमपरेण ताडितं २मैड्डुकवद्ध्वनतीति प्रसिद्धम् । तेन वल्गु सुन्दरं यथा तथा वल्गद्भिश्चलैर्घनैः स्तनतटैः स्खलितानि स्खलनं गतानि गमितानि वा जलानि पूर्वोक्तनगनिम्नगासलिलानि मन्दं जग्मुः । अत्र जलमन्दगमनस्य विशेषणगत्या रयप्रतिबन्धादिपदार्थहेतुकत्वात्काव्यलिङ्गम्
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ना | भि | ह्र | दैः | प | रि | गृ | ही | त | र | या | णि | नि | म्नैः | |
| स | त्री | णां | बृ | ह | ज्ज | घ | न | से | तु | नि | वा | रि | ता | नि |
| ज | ग्मु | र्ज | ला | नि | ज | ल | मु | ड्ड | क | वा | द्य | व | ल्गु | |
| व | ल्ग | द्ध | न | स्त | न | त | ट | स्ख | लि | ता | नि | म | न्दम् | |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | |||||||||
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