प्रस्वेदवारिसविशेषविषक्तमङ्गे
कूर्पासकं क्षतनखक्षतमुत्क्षिपन्ती ।
आविर्भवद्वनपयोधरबाहुमूला
शातोदरी युवदृशां क्षणमुत्सवोऽभूत् ॥
प्रस्वेदवारिसविशेषविषक्तमङ्गे
कूर्पासकं क्षतनखक्षतमुत्क्षिपन्ती ।
आविर्भवद्वनपयोधरबाहुमूला
शातोदरी युवदृशां क्षणमुत्सवोऽभूत् ॥
कूर्पासकं क्षतनखक्षतमुत्क्षिपन्ती ।
आविर्भवद्वनपयोधरबाहुमूला
शातोदरी युवदृशां क्षणमुत्सवोऽभूत् ॥
मल्लिनाथः
प्रस्वेदेति ॥ अङ्गे गात्रे प्रस्वेदवारिणा सविशेषं सातिशयं यथा तथा विषक्तमतिश्लिष्टं कूर्पासकं चोलकम् । कञ्चुकमित्यर्थः । `चोलः कूर्पासकोऽस्त्रियाम्` इत्यमरः । क्षतानि पुनर्विदीर्णानि नखक्षतानि यस्मिन्कर्मणि तद्यथा तथा उत्क्षिपन्ती उन्मोचयन्ती अत एवाविर्भवत्प्रकाशमानं घनपयोधरबाहुमूलं घनौ पयोधरौ बाहुमूले च यस्याः सा शातोदरी । `नासिकोदर-` (अष्टाध्यायी ४.१.५५ ) इत्यादिना ङीप् । युवदृशां क्षणमुत्सवोऽभूत् । एतेन यूनां त्वराचिन्तादिकरमिष्टवस्त्ववलोकननिमित्तं कालाक्षमत्वलक्षणमौत्सुक्यं व्यज्यते । नायिकाभिसारिणी प्रगल्भा वा
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | स्वे | द | वा | रि | स | वि | शे | ष | वि | ष | क्त | म | ङ्गे |
| कू | र्पा | स | कं | क्ष | त | न | ख | क्ष | त | मु | त्क्षि | प | न्ती |
| आ | वि | र्भ | व | द्व | न | प | यो | ध | र | बा | हु | मू | ला |
| शा | तो | द | री | यु | व | दृ | शां | क्ष | ण | मु | त्स | वो | ऽभूत् |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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