मधुकरविटपानमिता-
स्तरुपङ्क्तीर्बिभ्रतःऽस्य विटपानमिताः ।
परिपाकपिशङ्गलता-
रजसा रोधश्चकास्ति कपिशं गलता ॥
मधुकरविटपानमिता-
स्तरुपङ्क्तीर्बिभ्रतःऽस्य विटपानमिताः ।
परिपाकपिशङ्गलता-
रजसा रोधश्चकास्ति कपिशं गलता ॥
स्तरुपङ्क्तीर्बिभ्रतःऽस्य विटपानमिताः ।
परिपाकपिशङ्गलता-
रजसा रोधश्चकास्ति कपिशं गलता ॥
मल्लिनाथः
मधुकरेति ॥ मधुकरा एव विटास्तेषां पानं चुम्बनमिताः प्राप्ताः । इणः कर्तरि क्तः । विटपैः शाखाविस्तारैरानमिताः विटपानमिताः । विस्तारो विटपोsस्त्रियाम्` इत्यमरः । तरुपङ्क्तीर्बिभ्रतोऽस्याद्रेः रोधो नितम्बो गलता पतता परिपाकेण पिशङ्गीनां लतानां रजः पुष्परेणुः तेन परिपाकपिशङ्गलतारजसा कपिशं पिशङ्गं चकास्ति । मात्रावृत्तिष्वियमार्यागीतिरष्टगणा । `अर्धे वसुगण आर्यागीतिः` इति पिङ्गलनागः (३१)
छन्दः
आर्यागीतिः []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | धु | क | र | वि | ट | पा | न | मि | ता | ||||
| स्त | रु | प | ङ्क्ती | र्बि | भ्र | तः | ऽस्य | वि | ट | पा | न | मि | ताः |
| प | रि | पा | क | पि | श | ङ्ग | ल | ता | |||||
| र | ज | सा | रो | ध | श्च | का | स्ति | क | पि | शं | ग | ल | ता |
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