निशवासधूमं सहरत्नभा-
र्भित्त्वोत्थितं भूमिमिवोरगाणां ।
नीलोपलस्यूतविचित्रधातु-
मसौ गिरिं रैवतकं ददर्श ॥
निशवासधूमं सहरत्नभा-
र्भित्त्वोत्थितं भूमिमिवोरगाणां ।
नीलोपलस्यूतविचित्रधातु-
मसौ गिरिं रैवतकं ददर्श ॥
र्भित्त्वोत्थितं भूमिमिवोरगाणां ।
नीलोपलस्यूतविचित्रधातु-
मसौ गिरिं रैवतकं ददर्श ॥
मल्लिनाथः
निःश्वासेति ॥ नीलोपलैरिन्द्रनीलमणिभिः स्यूताः प्रोता विचित्रा नानावर्णा धातवो गैरिकादयो यस्य तम् । अत एव रत्नभाभिर्मणिप्रभाभिः सह भूमिं भित्त्वा, उत्थितमूर्ध्वं निर्गतं उरगाणां निःश्वासधूमं फूत्कारबाष्पमिव स्थितं रैवताख्यं गिरिमसौ हरिददर्श । स्यूतेति सीव्यतेः कर्मणि क्तः । `च्छ्वोः शूडनुनासिके च` (अष्टाध्यायी ६.४.१९ ) इत्युडादेशे यणादेशः । अत्र गिरेविशिष्टवर्णनीयत्वेन विशिष्टधूमत्वोत्प्रेक्षणाद्गुणनिमित्तजातिस्वरूपोत्प्रेक्षा । सर्गेऽस्मिन्ननावृत्तानि । तत्रादावष्टादशोपजातयः । तल्लक्षणं तूक्तमतीतानन्तरसर्गादौ । अत्रासर्गसमाप्येर्गिरिवर्णनमेव
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | श | वा | स | धू | मं | स | ह | र | त्न | भा |
| र्भि | त्त्वो | त्थि | तं | भू | मि | मि | वो | र | गा | णां |
| नी | लो | प | ल | स्यू | त | वि | चि | त्र | धा | तु |
| म | सौ | गि | रिं | रै | व | त | कं | द | द | र्श |
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