तमागतं वीक्ष्य युगान्तबन्धु-
मुत्सङ्गशय्याशयमम्बुराशिः ।
प्रत्युज्जगामेव गुरुप्रमोद-
प्रसारितोत्तुङ्गतरङ्गबाहुः ॥
तमागतं वीक्ष्य युगान्तबन्धु-
मुत्सङ्गशय्याशयमम्बुराशिः ।
प्रत्युज्जगामेव गुरुप्रमोद-
प्रसारितोत्तुङ्गतरङ्गबाहुः ॥
मुत्सङ्गशय्याशयमम्बुराशिः ।
प्रत्युज्जगामेव गुरुप्रमोद-
प्रसारितोत्तुङ्गतरङ्गबाहुः ॥
मल्लिनाथः
तमिति ॥ अम्बुराशिः युगान्तबन्धुम् । आपद्धन्धुमित्यर्थः । उत्सङ्ग एव शय्या तस्यां शेत इति तथोक्तम् । `अधिकरणे शेतेः` (अष्टाध्यायी ३.२.१५ ) इत्यच्प्रत्ययः । आगतमभ्यागतं तं हरिं वीक्ष्य गुरुणा प्रमोदेन प्रसारिता उत्तुङ्गास्तरङ्गा एव बाहवो यस्य सः सन् प्रत्युज्जगाम संमेलनार्थमागतवानिवेति क्रियास्वरूपोत्प्रेक्षा
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | मा | ग | तं | वी | क्ष्य | यु | गा | न्त | ब | न्धु |
| मु | त्स | ङ्ग | श | य्या | श | य | म | म्बु | रा | शिः |
| प्र | त्यु | ज्ज | गा | मे | व | गु | रु | प्र | मो | द |
| प्र | सा | रि | तो | त्तु | ङ्ग | त | र | ङ्ग | बा | हुः |
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