लक्षीभृतःऽम्भोधितटाधिवासा-
न्द्रमानसौ नीरदनीलभासः ।
लतावधूसंप्रयुजोऽदिवेलं
बहूकृतान्स्वानिव पशयति स्म ॥
लक्षीभृतःऽम्भोधितटाधिवासा-
न्द्रमानसौ नीरदनीलभासः ।
लतावधूसंप्रयुजोऽदिवेलं
बहूकृतान्स्वानिव पशयति स्म ॥
न्द्रमानसौ नीरदनीलभासः ।
लतावधूसंप्रयुजोऽदिवेलं
बहूकृतान्स्वानिव पशयति स्म ॥
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ल | क्षी | भृ | तः | ऽम्भो | धि | त | टा | धि | वा | सा | |
| न्द्र | मा | न | सौ | नी | र | द | नी | ल | भा | सः | |
| ल | ता | व | धू | सं | प्र | यु | जो | ऽदि | वे | लं | |
| ब | हू | कृ | ता | न्स्वा | नि | व | प | श | य | ति | स्म |
| ज | त | ज | ग | ग | |||||||
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