निसर्गरक्तैर्वलयावनद्ध-
ताम्राश्मरश्मिच्छुरितैर्नखाग्रैः ।
व्यद्योताद्यापि सुरारिवक्षो-
विक्षोभजासृक्स्नपितैरिवासो ॥
निसर्गरक्तैर्वलयावनद्ध-
ताम्राश्मरश्मिच्छुरितैर्नखाग्रैः ।
व्यद्योताद्यापि सुरारिवक्षो-
विक्षोभजासृक्स्नपितैरिवासो ॥
ताम्राश्मरश्मिच्छुरितैर्नखाग्रैः ।
व्यद्योताद्यापि सुरारिवक्षो-
विक्षोभजासृक्स्नपितैरिवासो ॥
मल्लिनाथः
निसर्गेति ॥ असौ हरिर्निसर्गरक्तैः स्वभावलोहितैः । किंच वलये कटके `कटकं वलयोऽस्त्रियाम्` इत्यमरः । तयोरवनद्धानां प्रत्युप्तानां ताम्राश्मनां पद्मरागाणां रश्मिभिः छुरितैः अत एवाद्यापि सुरारेर्हिरण्यकशिपोर्वक्षसो विक्षोभेण विदारणेन जाता याऽसृक्तया स्नपितैः सिक्तैरिव स्थितैरित्युत्प्रेक्षा। स्नातेर्ण्यन्तात् क्तः । `अर्तिह्री-` (अष्टाध्यायी ७.३.३६ ) इत्यादिना पुगागमः । मितां ह्रस्वः । नखाग्रैर्व्यद्योतत । कटके च धृतवानित्यर्थः
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | स | र्ग | र | क्तै | र्व | ल | या | व | न | द्ध |
| ता | म्रा | श्म | र | श्मि | च्छु | रि | तै | र्न | खा | ग्रैः |
| व्य | द्यो | ता | द्या | पि | सु | रा | रि | व | क्षो | |
| वि | क्षो | भ | जा | सृ | क्स्न | पि | तै | रि | वा | सो |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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