परस्पस्फर्धिपरार्घ्यरूपाः
पौरस्त्रियो यत्र विधाय वेधाः ।
श्रीनिर्मितप्राप्तगुणक्षतैक-
वर्णोपमावाच्यमलं ममार्ज ॥
परस्पस्फर्धिपरार्घ्यरूपाः
पौरस्त्रियो यत्र विधाय वेधाः ।
श्रीनिर्मितप्राप्तगुणक्षतैक-
वर्णोपमावाच्यमलं ममार्ज ॥
पौरस्त्रियो यत्र विधाय वेधाः ।
श्रीनिर्मितप्राप्तगुणक्षतैक-
वर्णोपमावाच्यमलं ममार्ज ॥
मल्लिनाथः
परस्परेति ॥ यत्र पुरि परस्परस्पर्धीन्यहमहमिकयाऽन्योन्यसामर्षाणि परार्ध्यानि श्रेष्ठानि रूपाणि सौन्दर्याणि यासां ताः। `रूपं स्वरूपे सौन्दर्ये` इति विश्वः । पुरे भवाः पौरस्ताः स्त्रियः पौरस्त्रियः। `स्त्रियाः पुंवत्-` (अष्टाध्यायी ६.३.३४ ) इत्यादिना पुंवद्भावः। विधाय निर्माय वेधाः स्रष्टा श्रियो लक्ष्मीदेव्याः निर्मित्या निर्माणेन प्राप्तं यत् घुणेन वज्रकीटेन क्षतस्योत्कीर्णस्यैकवर्णस्योपमया साम्येन वाच्यमपवादः तदलमत्यन्तम् । तदेव मलमिति केचित् । ममार्ज । घुणाक्षरवत् यादृच्छिकमिदं श्रीदेवतासौन्दर्यशिल्पं न कौशलमित्ययशः क्षालितवानित्यर्थः । अनया चातिशयोक्त्या पौरस्त्रीणां रमासमानसौन्दर्यं वस्तु व्यज्यते
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | र | स्प | स्फ | र्धि | प | रा | र्घ्य | रू | पाः | |
| पौ | र | स्त्रि | यो | य | त्र | वि | धा | य | वे | धाः |
| श्री | नि | र्मि | त | प्रा | प्त | गु | ण | क्ष | तै | क |
| व | र्णो | प | मा | वा | च्य | म | लं | म | मा | र्ज |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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