उपेयुषो वर्त्म निरन्तराभि-
रसौ निरुच्छ्वासमनीकनीभिः ।
रथस्य तस्यां पुरि दत्तचक्षु-
र्विद्वान्विदामास शनैर्न यातम् ॥
उपेयुषो वर्त्म निरन्तराभि-
रसौ निरुच्छ्वासमनीकनीभिः ।
रथस्य तस्यां पुरि दत्तचक्षु-
र्विद्वान्विदामास शनैर्न यातम् ॥
रसौ निरुच्छ्वासमनीकनीभिः ।
रथस्य तस्यां पुरि दत्तचक्षु-
र्विद्वान्विदामास शनैर्न यातम् ॥
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | पे | यु | षो | व | र्त्म | नि | र | न्त | रा | भि |
| र | सौ | नि | रु | च्छ्वा | स | म | नी | क | नी | भिः |
| र | थ | स्य | त | स्यां | पु | रि | द | त्त | च | क्षु |
| र्वि | द्वा | न्वि | दा | मा | स | श | नै | र्न | या | तम् |
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