ध्वजाग्रधामा ददृशेऽथशौरैः
संक्रन्तमूर्तिर्मणिमेदिनीषु ।
फणावतस्त्रासयितुं रसाया-
स्तलं विवक्षन्निव पन्नगारिः ॥
ध्वजाग्रधामा ददृशेऽथशौरैः
संक्रन्तमूर्तिर्मणिमेदिनीषु ।
फणावतस्त्रासयितुं रसाया-
स्तलं विवक्षन्निव पन्नगारिः ॥
संक्रन्तमूर्तिर्मणिमेदिनीषु ।
फणावतस्त्रासयितुं रसाया-
स्तलं विवक्षन्निव पन्नगारिः ॥
मल्लिनाथः
ध्वजेति ॥ अथ रथारोहणानन्तरं शौरेः कृष्णस्य ध्वजाग्रं धाम स्थानं यस्य सः मणिमेदिनीषु मणिमयकुट्टिमेषु संक्रान्तमूर्तिः प्रतिबिम्बिताङ्गः सन् पन्नगारिर्गरुत्मान् फणावतः सर्पान् त्रासयितुं द्रावयितुं रसायास्तलं पातालं विविक्षन् । प्रवेष्टुमिच्छन्निवेत्युत्प्रेक्षा । विशतेः सन्नन्ताल्लटः शत्रादेशः । ददृशे दृष्टः । सोऽपि संनिहितोऽभूदित्यर्थः
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ध्व | जा | ग्र | धा | मा | द | दृ | शे | ऽथ | शौ | रैः |
| सं | क्र | न्त | मू | र्ति | र्म | णि | मे | दि | नी | षु |
| फ | णा | व | त | स्त्रा | स | यि | तुं | र | सा | या |
| स्त | लं | वि | व | क्ष | न्नि | व | प | न्न | गा | रिः |
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