न नीतमन्येन नतिं कदाचि-
कर्णान्तिकप्रप्तगुणं क्रयासु ।
विधेयमस्या भवदन्तिकस्थं
शार्ङ्गं धनुर्मित्रमिव द्रढीयः ॥
न नीतमन्येन नतिं कदाचि-
कर्णान्तिकप्रप्तगुणं क्रयासु ।
विधेयमस्या भवदन्तिकस्थं
शार्ङ्गं धनुर्मित्रमिव द्रढीयः ॥
कर्णान्तिकप्रप्तगुणं क्रयासु ।
विधेयमस्या भवदन्तिकस्थं
शार्ङ्गं धनुर्मित्रमिव द्रढीयः ॥
मल्लिनाथः
न नीतमिति ॥ अन्येन पुरुषान्तरेण नतिमाकर्षणं भेदेन स्वानुकूल्यं च न नीतं न प्रापितम्, क्रियासु रणकर्मसु, हिताहितकृत्येषु च कर्णान्तिकं कर्णगोचरं प्राप्तो गुणो मौर्वी, आप्तताधर्मश्च यस्य तद्विधेयं क्रियासु वश्यं दृढीयः दृढतरम् । पीडासहतरमिति यावत् । शृङ्गस्य विकारः शार्ङ्गं नाम धनुः मित्रमिवास्य हरेरन्तिकस्थं संनिहितमभवत्
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | नी | त | म | न्ये | न | न | तिं | क | दा | चि |
| क | र्णा | न्ति | क | प्र | प्त | गु | णं | क्र | या | सु |
| वि | धे | य | म | स्या | भ | व | द | न्ति | क | स्थं |
| शा | र्ङ्गं | ध | नु | र्मि | त्र | मि | व | द्र | ढी | यः |
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