शतशः परुषाः पुरो विशङ्कं
शिशुपालेन शिलीमुखाः प्रयुक्ताः ।
परमर्मभिदोऽपि दानवारे-
रपराधा इव न व्यथां वितेनुः ॥
शतशः परुषाः पुरो विशङ्कं
शिशुपालेन शिलीमुखाः प्रयुक्ताः ।
परमर्मभिदोऽपि दानवारे-
रपराधा इव न व्यथां वितेनुः ॥
शिशुपालेन शिलीमुखाः प्रयुक्ताः ।
परमर्मभिदोऽपि दानवारे-
रपराधा इव न व्यथां वितेनुः ॥
मल्लिनाथः
शतश इति ॥ शिशुपालेन पुरोऽग्रे विशकं निःशकं शतशः प्रयुक्ताः क्षिप्ताः, उच्चारिताश्च परुषा निष्ठुराः परमर्मभिदोऽपि शिलीमुखाः शराः । शतशः अपराधाः पञ्चदशसर्गोक्ताः अभिशापा इव दानवारेहरेर्व्यथां दुःखं न वितेनुः । खलापकारा महतामकिंचित्करा इति भावः । समासगतोपमा
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श | त | शः | प | रु | षाः | पु | रो | वि | श | ङ्कं | |
| शि | शु | पा | ले | न | शि | ली | मु | खाः | प्र | यु | क्ताः |
| प | र | म | र्म | भि | दो | ऽपि | दा | न | वा | रे | |
| र | प | रा | धा | इ | व | न | व्य | थां | वि | ते | नुः |
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