शिखरोन्नतनिष्ठुरांसपीठः
स्थगयन्नेकदिगन्तमायतान्तः ।
निरवर्णि सकृत्प्रसारितोऽस्य
क्षितिभर्तेव चमूभिरेकबाहुः ॥
शिखरोन्नतनिष्ठुरांसपीठः
स्थगयन्नेकदिगन्तमायतान्तः ।
निरवर्णि सकृत्प्रसारितोऽस्य
क्षितिभर्तेव चमूभिरेकबाहुः ॥
स्थगयन्नेकदिगन्तमायतान्तः ।
निरवर्णि सकृत्प्रसारितोऽस्य
क्षितिभर्तेव चमूभिरेकबाहुः ॥
मल्लिनाथः
शिखरेति ॥ शिखरं शृङ्गमिवोन्नतं निष्ठुरं चांसपीठं यस्य स एकदिगन्तं एकदिग्भागं स्थगयन् आयताम्तो द्वाधिष्ठस्वरूपः । `अन्तोऽध्यवसिते मृत्यौ स्वरूपे निश्चयेऽन्तिके` इति वैजयन्ती । सकृपसारितः न तु पुनःपुनरिति स्थैर्योक्तिः । अस्य हरेरेकबाहुः । चापरोपितो वामबाहुरित्यर्थः । चमूभिः क्षितिभर्तेव भूधर इव निरवर्णि । साधु निरीक्षित इत्यर्थः । `निर्वर्णनं तु निध्यानं दर्शनालोकनेक्षणम्` इत्यमरः
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शि | ख | रो | न्न | त | नि | ष्ठु | रां | स | पी | ठः | |
| स्थ | ग | य | न्ने | क | दि | ग | न्त | मा | य | ता | न्तः |
| नि | र | व | र्णि | स | कृ | त्प्र | सा | रि | तो | ऽस्य | |
| क्षि | ति | भ | र्ते | व | च | मू | भि | रे | क | बा | हुः |
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