उरसा विततेन पातितांसः
स मयूराञ्चितमस्तकस्तदानीम् ।
क्षणमालिखितो नु सौष्ठवेन
स्थिरपूर्वापरमुष्टिराबभौ वा ॥
उरसा विततेन पातितांसः
स मयूराञ्चितमस्तकस्तदानीम् ।
क्षणमालिखितो नु सौष्ठवेन
स्थिरपूर्वापरमुष्टिराबभौ वा ॥
स मयूराञ्चितमस्तकस्तदानीम् ।
क्षणमालिखितो नु सौष्ठवेन
स्थिरपूर्वापरमुष्टिराबभौ वा ॥
मल्लिनाथः
उरसेति ॥ तदानीं धनुष्कर्षणसमये विततेन विस्तारितेनोरसा उपलक्षितः पातितांसो नमितस्कन्धः मयूरवदञ्चितं मनोहरं मस्तकं यस्य सः । उन्नमितमूर्धेत्यर्थः । स्थिरौ दृढौ पूर्वापरौ अग्रिमचरमौ मुष्टी गृहीतलस्तकमौर्वीकौ पाणी यस्य स हरिः । सुष्टु भावः सौष्ठवं तेन सौष्ठवेन स्थानकपाटवेन हेतुना क्षणमालिखितो नु लिखित इव आबभौ वा बभासे किम् । नुशब्दो वितर्कार्थे । `नु पृच्छायां वितर्के च` इत्यमरः । वाशब्दोऽपि तादृश इत्युत्प्रेक्षालंकारोऽयम्
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | र | सा | वि | त | ते | न | पा | ति | तां | सः | |
| स | म | यू | रा | ञ्चि | त | म | स्त | क | स्त | दा | नीम् |
| क्ष | ण | मा | लि | खि | तो | नु | सौ | ष्ठ | वे | न | |
| स्थि | र | पू | र्वा | प | र | मु | ष्टि | रा | ब | भौ | वा |
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