मल्लिनाथः
बह्वपीति ॥ स्वेच्छया स्वप्रतिभानुसारेण प्रकीर्णमसंगतं बह्वपि कामं यथेष्टमभिधीयते । किंतु, अनुज्झितोऽर्थसंबन्धः पदार्थसंगतिर्यस्मिन् स प्रबन्धः संदर्भः दुरुदाहरो दुर्वचः । हरतेः खल्प्रत्ययः । रामेण तु संगतमेवोक्तमिति स्तुतिः, असंगतमेवोक्तमिति निन्दा च गम्यते
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ब | ह्व | पि | स्वे | च्छ | या | का | मं |
| प्र | की | र्ण | म | भि | धी | य | ते |
| अ | नु | ज्झि | त | र्थ | सं | ब | न्धः |
| प्र | ब | न्धो | दु | रु | दा | ह | रः |
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