मल्लिनाथः
अङ्केति ॥ अङ्कमुत्सङ्गमधिरोपितो मृगो येन स चन्द्रमा मृगलाञ्छनः मृगाङ्कः । तथा निष्ठुरं यथा तथा क्षिप्तो हतो मृगयूथो मृगसमूहो येन स केसरी सिंहो मृगाधिपः । उभयत्रापि ख्यात इति शेषः । तस्माच्छत्रौ मार्दवं दुष्कीर्तये, पौरुषं तु कीर्तये इति भावः । अत्राप्रस्तुतकथनात् प्रस्तुतार्थप्रतीतेरप्रस्तुतप्रशंसा
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ङ्गा | धि | रो | पि | त | श्च | |
| न्द्र | मा | मृ | ग | ला | ञ्छ | नः | |
| के | श | री | नि | ष्ठु | रा | क्षि | प्त |
| मृ | ग | यू | थो | मृ | गा | धि | पः |
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