मल्लिनाथः
बाणेति ॥ रणमेवाटवी रणाटवी बाणैरिवाहिभिः पूर्णा तूणीरा निषङ्गा एव कोटराः कुहरा येषां तैः गोधास्तलानि, निहाकाश्च । `गोधा तले निहाकायाम्` इति विश्वः । तलं ज्याघातवारणम् । ततो गोधा एव गोधा इति श्लिष्टरूपकम् । ताभिराश्लिष्टा भुजा एव शाखा येषां तैर्धन्विभिर्धानुष्कैरेव शाखिभिर्वृक्षैर्भीमा भयंकरा अभूत् । समस्तवस्तुवर्णनात्सावयवरूपकम्
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बा | णा | हि | त | पू | र्ण | तू | णी | |
| र | को | ट | रै | र्ध | न्वि | शा | खि | भिः |
| गो | धा | श्लि | ष्ट | भु | जा | शा | खै | |
| र | भू | द्भी | मा | र | णा | ट | वी |
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