भृङ्गश्रेणीश्यामभासां समूहै-
र्नाराचानां विद्धनीरन्ध्रदेहः ।
निर्भीकत्वादाहवेनाहतेच्छो
हृष्यन्हस्ती हृष्टरोमेव रेजे ॥
भृङ्गश्रेणीश्यामभासां समूहै-
र्नाराचानां विद्धनीरन्ध्रदेहः ।
निर्भीकत्वादाहवेनाहतेच्छो
हृष्यन्हस्ती हृष्टरोमेव रेजे ॥
र्नाराचानां विद्धनीरन्ध्रदेहः ।
निर्भीकत्वादाहवेनाहतेच्छो
हृष्यन्हस्ती हृष्टरोमेव रेजे ॥
मल्लिनाथः
भृङ्गेति ॥ भृङ्गश्रेणीव श्यामभासां कृष्णवर्णानां नाराचानामयोमयेषुविशेषाणां समूहैः विद्धो नीरन्ध्रो निर्विवरो देहो यस्य सः । तथापि निर्भीकत्वादाहवेनाहतेच्छः अव्याहतोत्साहः अत एव हृष्यन्मोदमानो हस्ती हृष्टरोमेव हर्षात्पुलकित इवेत्युत्प्रेक्षा । `हृषेर्लोमसु` (अष्टाध्यायी ७.२.२९ ) इति विकल्पादिडभावः । रेजे शुशुभे । `फणां च सप्तानाम्` (अष्टाध्यायी ६.४.१२५ ) इति विकल्पादेत्वाभ्यासलोपौ
छन्दः
शालिनी [११: मततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भृ | ङ्ग | श्रे | णी | श्या | म | भा | सां | स | मू | है |
| र्ना | रा | चा | नां | वि | द्ध | नी | र | न्ध्र | दे | हः |
| नि | र्भी | क | त्वा | दा | ह | वे | ना | ह | ते | च्छो |
| हृ | ष्य | न्ह | स्ती | हृ | ष्ट | रो | मे | व | रे | जे |
| म | त | त | ग | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.