विषङ्गिणि प्रतिपदमापिबत्यपो
हताचिरद्युतिनि समीरलक्ष्मणि ।
शनैःशनैरुपचितपङ्कभारिकाः
पयोमुचः प्रययुरपेतवृष्टयः ॥
विषङ्गिणि प्रतिपदमापिबत्यपो
हताचिरद्युतिनि समीरलक्ष्मणि ।
शनैःशनैरुपचितपङ्कभारिकाः
पयोमुचः प्रययुरपेतवृष्टयः ॥
हताचिरद्युतिनि समीरलक्ष्मणि ।
शनैःशनैरुपचितपङ्कभारिकाः
पयोमुचः प्रययुरपेतवृष्टयः ॥
मल्लिनाथः
विषङ्गिणीति ॥ विषङ्गिणि विषक्ते अत एव हताचिरद्युतिनि विरमिताचिरद्युतिनि समीरलक्ष्मणि वातकेतौ रजसि प्रतिपदं प्रतिक्षणमपोऽम्भांस्यपिबत्याकर्षति सति अत एवापेतवृष्टयो निवृत्तवर्षाः पयोमुचः उपचिताः प्रवर्धिताः पङ्कभारिकाः पङ्कभरणानि येषां ते उपचितपङ्कमारिकाः सन्तः । `पर्यायार्हर्णोत्पत्तिषु ण्वुल` (अष्टाध्यायी ३.३.१११ ) इत्यर्हणार्थे ण्वुल प्रत्ययः । अर्हणं च करणसामर्थ्यम् । अत एव भाराच्छनैः शनैः प्रययुः प्राप्ताः । अत्र पयोमुचां पङ्कभरणासंबन्धेऽपि तत्संबन्धोक्तेरतिशयोक्तिः
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | ष | ङ्गि | णि | प्र | ति | प | द | मा | पि | ब | त्य | पो |
| ह | ता | चि | र | द्यु | ति | नि | स | मी | र | ल | क्ष्म | णि |
| श | नैः | श | नै | रु | प | चि | त | प | ङ्क | भा | रि | काः |
| प | यो | मु | चः | प्र | य | यु | र | पे | त | वृ | ष्ट | यः |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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