प्रकुप्यतः श्वसनसमीरणाहति-
स्फुटोष्मभिस्तनुवसनान्तमारुतैः ।
युधाजितः कृतपरितूर्णवीजनं
पुनस्तरां वदनसरोजमस्विदत् ॥
प्रकुप्यतः श्वसनसमीरणाहति-
स्फुटोष्मभिस्तनुवसनान्तमारुतैः ।
युधाजितः कृतपरितूर्णवीजनं
पुनस्तरां वदनसरोजमस्विदत् ॥
स्फुटोष्मभिस्तनुवसनान्तमारुतैः ।
युधाजितः कृतपरितूर्णवीजनं
पुनस्तरां वदनसरोजमस्विदत् ॥
मल्लिनाथः
प्रकुप्यत इति ॥ प्रकुप्यतोऽतिक्रुध्यतो युधाजितो नाम राज्ञो वदनसरोज श्वसनसमीरणस्य निःश्वासमारुतस्याहतिभिः स्फुटः प्रकट ऊष्मा उष्णत्वं येषां ते तैः तनुवसनान्तमारुतैः सूक्ष्मवस्त्राञ्चलवातैः कृतं परिपूर्णवीजनं शीघ्रविधूननं यस्य तत् । अतिशीघ्र वीज्यमानमपीत्यर्थः । पुनस्तरां पुनरत्यन्तम् । अव्ययादामुप्रत्ययः । अस्विदत्स्विद्यति स्म । स्विदेर्लुङि पुषादित्वादङ्प्रत्ययः । अत्रोष्मविशेषणगत्या स्वेदहेतुत्वाकाव्यलिङ्गम् , वीजनेऽपि स्वेद इति विरोधः । वीचिरयं चुरादिष्वन्वेषणीयः
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | कु | प्य | तः | श्व | स | न | स | मी | र | णा | ह | ति |
| स्फु | टो | ष्म | भि | स्त | नु | व | स | ना | न्त | मा | रु | तैः |
| यु | धा | जि | तः | कृ | त | प | रि | तू | र्ण | वी | ज | नं |
| पु | न | स्त | रां | व | द | न | स | रो | ज | म | स्वि | दत् |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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